इलेक्टोरल बाॅण्ड - चुनावी चन्दे की वैधानिकता और पारदर्शिता
(Electoral Bond – Legality and Transparency in
Election Donation)
इलेक्टोरल बॉण्ड राजनीतिक दलों को चन्दा या दान करने के लिए एक पारदर्शी टूल है। दाता इस बाॅण्ड को डिजीटल या चेक के माध्यम से भुगतान करके खरीद सकता है, फिर राजनीतिक दल जिसके लिए दाता ने दान किया है, इन बाॅण्डों को अपने बैंक खातों के माध्यम से नकद में वापस ले सकते हैं। देश के सभी बुद्धिजीवियों और चुनाव सुधार से जुड़ी संस्थाओं, व्यक्तियों का यह सुझाव है कि चुनावी चन्दा पारदर्शी होना चाहिए। चुनावी चन्दे में पारदर्शिता के बिना चुनाव सुधारों की बात करना बेमानी है। देश को जानने का पूरा अधिकार है कि किस राजनीतिक दल को कहां से कितना धन मिल रहा है और देने वाला कौन है।
इलेक्टोरल बाॅण्ड राजनीतिक दलों को चुनावी खर्चों के लिए दिये जाने वाले चन्दे की एक नवीन अवधारणा है। चुनावी चन्दे को वैधानिक जामा पहनाने के उद्देश्य से इसे प्रारम्भ किया गया है। इसके विरूद्ध लोकतांत्रिक सुधार संघ तथा काॅमन काॅज संस्थाओं द्वारा सुप्रीम कोर्ट में जनहित याचिकाएं दायर की हैं।
जनहित याचिका की सुनवाई के दौरान सुप्रीम कोर्ट ने चुनावी बाॅण्ड पर रोक से इनकार कर दिया। सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि राजनीतिक दलों को चुनावी बाॅण्ड से मिले पैसे, उसे देने वाले और अकाउंट की जानकारी सिर्फ चुनाव आयोग को देनी होगी। सभी राजनीतिक दलों को निर्देश दिया है कि वे चुनाव आयोग को सीलबंद लिफाफे में बताएं कि उन्हें बाॅण्ड के जरिए कितना पैसा मिला है। साथ ही यह भी बताएं कि किसने कितना चन्दा दिया और किस खाते में जमा कराया गया। सुप्रीम कोर्ट ने कहा है कि चुनाव आयोग भी अगले आदेश तक बाॅण्ड से एकत्रित धनराशि का ब्योरा सीलबंद लिफाफे में ही रखें। एसोसिएशन फाॅर डेमोक्रेटिक रिफोर्म और काॅमन काॅज संस्थाओं ने इस मामले में जनहित याचिकाएं दायर की थी।
इलेक्टोरल बाॅण्ड की संकल्पना -
पाॅलिटिकल फंडिंग के लिए 2016 में चुनावी बाॅण्ड की अवधारणा शुरू की गई। इनमें तीन पक्ष होते हैं। पहला - चन्दा देने वाला। यह व्यक्ति, कंपनी या संस्था हो सकती है। दूसरा - देश में राष्ट्रीय और क्षेत्रीय राजनीतिक दल, जिसे यह दिया जाता है। तीसरा - देश का केन्द्रीय बैंक ‘रिजर्व बैंक ऑफ इंडिया’, जहां से बाॅण्ड जारी होता है। बाॅण्ड एक हजार, दस हजार, एक लाख, दस लाख और एक करोड़ रू. का हो सकता है।
दुनिया में पहली बार भारत में जारी हुआ इलेक्टोरल बाॅण्ड -
पॉलिटिकल फंडिग और राजनीति में भ्रष्टाचार पर लगाम लगाने के उद्देश्य के साथ भारत पहला देश है जहाँ इस तरह का बॉण्ड जारी किया जाता है। वहीं कुछ देशों में राजनीतिक पार्टियों का पूरा खर्च सरकार द्वारा वहन किया जाता है जिससे राजनीतिक दलों में भ्रष्टाचार न पनपने पाए। इस बॉण्ड के मदद से राजनीतिक दलों को मिलने वाले ब्लैकमनी को पूरी तरह से व्हाइट रखने की कोशिश की जाएगी।
पॉलिटिकल फंडिग और राजनीति में भ्रष्टाचार पर लगाम लगाने के उद्देश्य के साथ भारत पहला देश है जहाँ इस तरह का बॉण्ड जारी किया जाता है। वहीं कुछ देशों में राजनीतिक पार्टियों का पूरा खर्च सरकार द्वारा वहन किया जाता है जिससे राजनीतिक दलों में भ्रष्टाचार न पनपने पाए। इस बॉण्ड के मदद से राजनीतिक दलों को मिलने वाले ब्लैकमनी को पूरी तरह से व्हाइट रखने की कोशिश की जाएगी।
इलेक्टोरल बॉण्ड का महत्व - इलेक्टोरल बॉण्ड का लक्ष्य है कि दान दाता दान करने के लिए बैंकिंग मार्ग का इस्तेमाल करें, ताकि जारीकर्ता प्राधिकरण में उसकी पहचान बनी रहे। ऐसा इसलिए क्योंकि एसोसिएशन फॉर डेमोक्रेटिक रिफॉर्म्स (एडीआर) के मुताबिक, भारत में राजनीतिक दल अज्ञात स्रोतों से नकद दान स्वीकार करते हैं और पिछले 11 वर्ष की अवधि में पार्टी निधि में 11,300 करोड़ रुपए का लगभग 70% अज्ञात स्रोतों चन्दा से आया है।
रिजर्व बैंक का बॉण्ड -
केन्द्रीय रिजर्व बैंक देश में करेंसी के संचार और क्रेडिट व्यवस्था को रेगुलेट करता है। वित्त मंत्रालय के कर्ज के बोझ को कम करने के लिए रिजर्व बैंक समय-समय पर कई तरह के बॉण्ड जारी करता है। इन बॉण्ड को पाँच साल की मैच्योरिटी पीरियड के साथ जारी किया जाता है, हालांकि मैच्योरिटी से पहले भी इन बॉण्ड्स को मार्केट में बेचकर निवेश किए हुए पैसे को निकाला जा सकता है। रिजर्व बैंक के जारी इन बॉण्ड्स को सिर्फ भारतीय नागरिक और गैर-प्रवासी भारतीयों को ही खरीदने की इजाजत होती है।
वैधानिक स्थिति -
भारत में इलेक्टोरल बाॅण्ड की सर्वप्रथम 2017-18 के केन्द्रीय बजट में घोषणा की गई। तत्पश्चात वित्तीय विधेयक 2017 की धारा 133 से 136 के माध्यम से भारतीय रिजर्व बैंक अधिनियम 1934 की धारा 31(3) तथा लोक प्रतिनिधित्व अधिनियम 1951 में संशोधन का इलेक्टोरल बाॅण्ड को वैधानिक जामा पहनाया गया। चुनावी चन्दे के बाॅण्ड्स की यह स्कीम सर्वप्रथम मार्च 2018 से प्रारम्भ हुई। अब वर्तमान में कोई भी राजनीतिक दल दो हजार रूपए से अधिक नकद (कैश) चन्दा या दान स्वीकार नहीं कर सकेंगे।
इलेक्टोरल बॉन्ड की कुछ खास बातें -
- इस बॉण्ड को नोटीफाइड बैंक जारी करते हैं।
- इस बॉण्ड को सिर्फ चेक अथवा डिजिटल पेमेंट करके खरीदा जा सकता है।
- डोनर द्वारा खरीदे गए बॉण्ड को स्कीम के तहत तय समय के लिए राजनीतिक दलों को दिया जाता है।
- राजनीतिक दल अपने नोटिफाइड बैंक अकाउंट के जरिए इन बॉण्ड को कैश करा सकते हैं।
- इस बॉण्ड के लिए देश के सभी राजनीतिक दल को एक बैंक अकाउंट चुनाव आयोग के पास नोटिफाई कराना जरूरी है। जिसमें वह इस बॉण्ड के पैसे को प्राप्त कर सकते हैं।
- हर राजनीतिक दल को सालाना प्रतिवेदन में इलेक्टोरल बाॅण्ड की रकम का हिसाब देना होगा।
- यह इलेक्टोरल बॉण्ड एक बेयरर चेक की तरह होता है, जिससे बॉण्ड के जरिए डोनेशन देने वालों का नाम गुप्त रखा जा सके।
- इलेक्टोरल बॉण्ड सिर्फ 15 दिन के लिए वैध होता है, जिसके दौरान इसे राजनीतिक दलों को दान करने के लिए इस्तेमाल किया जा सकता है।
- इलेक्टोरल बॉण्ड राजनैतिक दल के रजिस्टर्ड खाते में ही जमा होते हैं और हर राजनैतिक दल को अपने सालाना प्रतिवेदन में यह बताना होगा कि उसे कितने बाॅण्ड मिले।
इलेक्टोरल बॉन्ड खरीदने के नियम एवं पात्रता -
- इलेक्टोरल बॉण्ड भारतीय स्टेट बैंक की चुनिंदा शाखाओं से मिलते हैं।
- बाॅण्ड खरीदने के लिए चन्दा देने वाले को केवाईसी देनी होती है। बैंक ब्याज नहीं देता।
- बैंक बाॅण्ड खरीदने वाले की जानकारी नहीं दे सकता।
- बाॅण्ड खरीदने का जिक्र बैलेंस शीट में करना होता है। इससे टैक्स रिबेट मिलता है।
- केवल वे राजनीतिक दल इलेक्टोरल बॉण्ड प्राप्त करने के पात्र होंगे जो लोक प्रतिनिधित्व अधिनियम 1951 की धारा 29-ए के तहत पंजीकृत हैं, और पिछले आम चुनाव या विधान सभा के मतदान में कम से कम 1% वोट हासिल कर पाए हों।
- इलेक्टोरल बाॅण्ड एक हजार रूपये, दस हजार, एक लाख, दस लाख एवं एक करोड़ तक हो सकते हैं।
- इलेक्टोरल बॉण्ड योजना माह में 10 दिनों की अवधि के लिए खरीदने के लिए उपलब्ध होगी।
- परन्तु जिस वर्ष लोक सभा चुनाव होंगे उस वर्ष भारत सरकार द्वारा बाॅण्ड खरीदने के लिए 30 दिन अतिरिक्त और दिए जायेंगे।
- बाॅण्ड जारी होने के 15 दिनों के भीतर उसका इस्तेमाल चन्दा देने के लिए करना होगा।
वर्तमान स्थिति -
इलेक्टोरल बाॅण्ड चुनाव सुधारों की दिशा में एक महत्वपूर्ण कदम है। 2017-18 की बजट घोषणा से इस स्कीम की शुरूआत हुई। सरकार द्वारा 2 जनवरी 2018 को इसे अधिसूचित किया जाये। इसके तहत अब राजनीतिक दल केवल दो हजार रूपए तक नकद चन्दा प्राप्त कर सकते हैं। इससे अधिक केवल चेक या बैंक या बाॅण्ड के माध्यम से ही लिया-दिया जा सकता है। भारत में चुनावों में राजनैतिक दल बहुत पैसा लगाते हैं। इन पैसों का स्रोत क्या होता है? वस्तुतः इसके लिए हर दल चन्दा लेता है। चन्दों के बारे में पहले यह नियम था कि बीस हजार रूपये से अधिक का चन्दा चैक के माध्यम से दिया जाए। बीस हजार रुपये से कम का चन्दा बिना किसी रसीद के दिया जा सकता था। राजनैतिक दल इस प्रावधान का भरपूर लाभ उठाते थे। उनका अधिकांश पैसा बिना रसीद ही आता था। इस प्रकार सम्बंधित राजनैतिक दल हिसाब देने से बच जाता था। यह स्पष्ट है कि बिना रसीद के लिए-दिए गए यह पैसे काला धन ही होते हैं। जिनके पास काला धन है वे ही यह चन्दा अपने स्वार्थ के लिए दिया करते हैं। यह पैसा राजनैतिक दल के पास पहुँचकर स्वयं एक नया काला धन हो जाता था। यदि काले धन को मिटाना है तो राजनैतिक चन्दे की इस प्रणाली को भी मिटाना आवश्यक था। अब केवल दो हजार रूपए तक का नकद चन्दा लिया-दिया जा सकता है, इससे अधिक नहीं।
आवश्यकता है कि किसी दल को दिया जाने वाला चन्दा पाई-पाई किसी बैंक के माध्यम से लिया-दिया जाए। बहुत दिनों से इस दिशा में उचित प्रस्ताव की तैयारी चल रही थी। इसी सन्दर्भ में भारत सरकार ने चन्दा आदान-प्रदान की एक नई प्रणाली लागू की है जिसमें सरकार के द्वारा चुनावी बाॅण्ड (Electoral बॉण्ड) जारी करने का प्रावधान है दिया गया है।
विवाद का विषय -
चुनावी बाॅण्ड एक पोमिसरी नोट (पी नोट्स) बेयरर चेक की तरह होता है, इसमें चन्दा देने वालों का नाम गुप्त रखा जाता है। इसी पर विवाद है, क्योंकि आरोप है कि पाटियां ही कालेधन को सफेद करने के लिए संस्थाओं के जरिए अवैध पैसे से बाॅण्ड खरीदवाती हैं। बैंकिंग तथ्यों के अनुसार 2018 में बाॅण्ड से 1,057 करोड़ मिले थे, 2019 में 3 महीने में ही 1,716 करोड़ रू. मिल गए। एक आकलन के मुताबिक 2018 से अब तक सबसे ज्यादा मुंबई में 878 करोड़ रू. के बाॅण्ड खरीदे गए। सबसे ज्यादा 95.54% राशि दिल्ली में निकाली गई, कोलकाता में 4.13% - एक भी बाॅण्ड मुंबई में कैश नहीं हुआ, जबकि सबसे ज्यादा 878 करोड़ रुपए के बाॅण्ड मुंबई में ही खरीदे गए थे।
इलेक्टोरल बाॅण्ड - शहर वार आँकड़े -
शहर 2018 2019 (31 मार्च तक)
मुंबई 383 495
कोलकाता 231 370
दिल्ली 147 205
हैदराबाद 105 290
भुवनेष्वर 15 194
गांधीनगर 18 73
चेन्नई 43 55
बेंगलुरू 82 17
जयपुर 21 9
चंडीगढ़ 1 0
रायपुर 6 0
राजनीतिक दलों को प्राप्त चन्दा और इन्हें देने वाले लोगों की जानकारी उपलब्ध कराने का सुप्रीम कोर्ट का आदेश चुनाव सुधारों की तरफ बड़ा कदम है। चुनावी बाॅण्ड पर इस आदेश को देश के भीतर एक अच्छी पहल के तौर पर देखा जा सकता है। केन्द्र सरकार इन बाॅण्ड को जारी रखने के लिए समयसीमा बढ़ाए जाने की मांग कर रही थी। सुप्रीम कोर्ट ने उस पर सवाल खड़े किए हैं, जो राजनीति में पारदर्शिता लाने के लिए जरूरी है। शीर्ष कोर्ट ने 30 मई तक की समयसीमा तय की है। इसके भीतर सभी पार्टियों को चुनावी बाॅण्ड के जरिए 15 मई तक मिले चन्दे की जानकारी चुनाव आयोग को देनी है। इतना ही नहीं, सभी दल यह भी बताएंगे कि पैसा किन खातों में ट्रांसफर किया गया है।
सुप्रीम कोर्ट ने चुनावी बाॅण्ड पर सवाल खड़े करते हुए यहां तक कह डाला था कि इनमें आने वाले पैसे की पारदर्शिता संदिग्ध है। क्या यह कालेधन को सफेद करने का माध्यम नहीं हैं? क्योंकि बैंक जब चुनावी बाॅण्ड जारी करता है तो उसके पास यह प्रमाण नहीं होता कि इन्हें किसके लिए जारी किया जा रहा है। इन्हें कोई भी भुना सकता है। काले धन पर रोक को लेकर जिस लड़ाई का दावा राजनीतिक दल करते हैं, वह इस बाॅण्ड से पूरा होता नहीं दिखाई देता है। चुनावों में पैसे का अंधाधुध इस्तेमाल होता है। ऐसे में जरूरी है कि राजनीतिक दलों को मिलने वाले चन्दे की जानकारी सार्वजनिक हों। उन्हें बताना चाहिए कि आखिर उनके पास चन्दा कहां से और किस माध्यम से आ रहा है।
देश में हर व्यक्ति के लिए एक कानून है। उसे लेन-देन की सभी जानकारी देने के लिए निर्धारित प्रक्रिया का पालन करना होता है। फिर यह प्रक्रिया राजनीतिक दलों के लिए अलग कैसे हो सकती है। जो बात सुप्रीम कोर्ट ने कही है, ठीक वही बात पूर्व मुख्य चुनाव आयुक्त ओपी रावत भी कह चुके हैं। उनका कथन है कि जब एक सरपंच चार-चार गाड़ियां लेकर लाखों रुपए चुनाव में फूंक देता है तो फिर वह पैसे कहां से निकालता है। स्वाभाविक है, उसकी नजर पंचायत के धन पर ही होगी। उन्होंने तो यहां तक कहा था कि हमारे देश में चुनाव एक निवेश है। जीतने के बाद रिटर्न आता है कहीं न कहीं उनकी इस बात में पूरी चुनाव प्रक्रिया का सार है। आज प्रत्याशियों के लिए खर्च की सीमा निर्धारित है, लेकिन पार्टियों के लिए नहीं। इसका फायदा प्रत्याशी और दल दोनों को ही मिल रहा है। प्रत्याशी हर बड़ा खर्च पार्टी के मद में दिखाकर बाहर हो जाता है। देश में चुनाव लगातार खर्चीले होते जा रहे हैं। गरीब प्रत्याशियों का चुनाव में खड़ा होना मुश्किल माना जाता है। वर्ष 2014 में निर्दलीय चुनाव लड़ने वाले सबसे गरीब प्रत्याशियों की सौ फीसदी हार हुई थी। हार के कारण कई और भी हो सकते हैं, लेकिन बड़ा कारण प्रत्याशियों के पीछे खर्च होने वाला राजनीतिक दलों का पैसा भी है।
देश में चुनाव सुधारों की सख्त जरूरत है। जिस तरह से दागी उम्मीदवारों के चुनाव लड़ने पर रोक लगी है, ठीक वैसे ही जरूरी है कि राजनीतिक दलों को मिलने वाले पैसे में पारदर्शिता हो। देश को जानने का पूरा अधिकार है कि किस राजनीतिक दल को कहां से धन मिल रहा है और देने वाले कौन है। राजनीतिक दलों को चन्दे में पारदर्शिता लाने के लिए खुद पहल करनी चाहिए। चुनाव सुधार के बगैर देश में मजबूत संसदीय प्रणाली की अपेक्षा नहीं की जा सकती है।
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