Sunday, August 15, 2021

तिरंगा - कल, आज और कल

 तिरंगा - कल, आज और कल

भारतीय राष्‍ट्रीय ध्‍वज को इसके वर्तमान स्‍वरूप में 22 जुलाई 1947 को आयोजित भारतीय संविधान सभा की बैठक के दौरान अपनाया गया था, जो 15 अगस्‍त 1947 को अंग्रेजों से भारत की स्‍वतंत्रता के कुछ ही दिन पूर्व की घटना थी। तिरंगे को 15 अगस्‍त 1947 और 26 जनवरी 1950 के बीच भारत के राष्‍ट्रीय ध्‍वज के रूप में अपनाया गया।

हमारे लिए तिरंगा बेहद महत्वपूर्ण और गौरव का विषय है। इस नाम के पीछे की वजह इसमें इस्तेमाल होने वाले तीन रंग हैं, केसरिया, सफेद और हरा। इसके मौजूदा स्वरूप का विकास भी कई पड़ावों में हुआ है।

तिरंगे की ऐतिहासिक पृष्ठभूमि -

हमारा राष्ट्रीय ध्वज का विकास आज के इस रूप में पहुंचने के लिए अनेक दौरों में से गुजरा। एक रूप से यह राष्ट्र में राजनैतिक विकास को दर्शाता है. हमारे राष्‍ट्रीय ध्‍वज के विकास में कुछ ऐतिहासिक पड़ाव भी आए। 

1906 में पहला राष्ट्रीय ध्वज -

पहला राष्‍ट्रीय ध्‍वज 7 अगस्‍त 1906 को पारसी बागान चौक (ग्रीन पार्क) कलकत्ता में फहराया गया था, जिसे अब कोलकाता कहते हैं। इस ध्‍वज को लाल, पीले और हरे रंग की क्षैतिज पट्टियों से बनाया गया था. इसमें ऊपर हरा, बीच में पीला और नीचे लाल रंग था. साथ ही इसमें कमल के फूल और चांद-सूरज भी बने थे

1907 में दूसरा राष्ट्रीय ध्वज - 

भारत का पहला गैर आधिकारिक ध्वज अधिक समय तक नहीं रहा और भारत को अगले ही साल नया राष्ट्र ध्वज मिला.दूसरा राष्ट्रीय ध्वज पेरिस में मैडम कामा और 1907 में उनके साथ निर्वासित किए गए कुछ क्रांतिकारियों द्वारा फहराया गया था. हालांकि, कई लोगों का कहना है कि यह घटना 1905 में हुई थी. यह भी पहले ध्‍वज के जैसा ही था. इस राष्ट्रध्वज में भी चांद सितारे आदि मौजूद था. साथ ही इसमें तीन रंग केसरिया, हरा और पीला शामिल था. बाद में इसे एक सम्मलेन के दौरान बर्लिन में भी फहराया गया था

1917 में तीसरा राष्ट्रीय ध्वज - 

तीसरा झंडा, 1917 में आया जब हमारे राजनैतिक संघर्ष ने एक निश्चित मोड लिया. डॉ. एनी बीसेंट और लोकमान्‍य तिलक ने घरेलू शासन आंदोलन के दौरान इसे फहराया. इस झंडे में 5 लाल और 4 हरी क्षैतिज पट्टियां एक के बाद एक और सप्‍तऋषि के अभिविन्‍यास में इस पर बने 7 सितारे थे. वहीं, बांई और ऊपरी किनारे पर (खंभे की ओर) यूनियन जैक था. एक कोने में सफेद अर्धचंद्र और सितारा भी था

1921 में चौथा राष्ट्रीय ध्वज - 

चौथा ध्वज अखिल भारतीय कांग्रेस कमेटी के सत्र के दौरान आंध्र प्रदेश के एक युवक ने एक झंडा बनाया और गांधी जी को दिया. यह कार्यक्रम साल 1921 में बेजवाड़ा (अब विजयवाड़ा) में किया गया था. यह दो रंगों का बना हुआ था. लाल और हरा रंग जो दो प्रमुख समुदायों अर्थात हिन्‍दू और मुस्लिम का प्रतिनिधित्‍व करता है. गांधी जी ने सुझाव दिया कि भारत के शेष समुदाय का प्रतिनिधित्‍व करने के लिए इसमें एक सफेद पट्टी और राष्‍ट्र की प्रगति का संकेत देने के लिए एक चलता हुआ चरखा होना चाहिए

1931 में पांचवां राष्ट्रीय ध्वज - 

1921 में निर्मित भारत का चौथा राष्ट्र ध्वज 10 सालों तक अस्तित्व में रहा. 1931 में हिंदुस्तान को एक बार फिर नया राष्ट्रध्वज मिला. चौथे राष्ट्रध्वज की तरह ही पांचवे राष्ट्रध्वज में भी चरखा का महत्वपूर्ण स्थान रहा. हालांकि रंगों में इस बार हेर-फेर हुआ. चरखा के साथ ही केसरिया, सफ़ेद और हरे रंग का संगम रहा. इंडियन नेशनल कांग्रेस (आईएनसी) ने औपचारिक रूप से इस ध्वज को अपनाया था

1947 को छठवां राष्ट्रीय ध्वज - 

अभी जो तिरंगा फहराया जाता है उसे 22 जुलाई 1947 को अपनाया गया था। तिरंगे को आंध्रप्रदेश के पिंगली वैंकैया ने बनाया था। वहीं  तिरंगे को फहराने के कुछ नियम भी हैं।

किसी मंच पर तिरंगा फहराते समय जब बोलने वाले का मुंह श्रोताओं की तरफ हो तब तिरंगा हमेशा उसके दाहिने तरफ होना चाहिए। बताया जाता है कि भारत के राष्ट्रीय ध्वज में जब चरखे की जगह अशोक चक्र लिया गया तो महात्मा गांधी नाराज हो गए थे। रांची का पहाड़ी मंदिर भारत का अकेला ऐसा मंदिर हैं जहां तिरंगा फहराया जाता हैं।

493 मीटर की ऊंचाई पर देश का सबसे ऊंचा झंडा भी रांची में ही फहराया गया है।

देश में 'फ्लैग कोड ऑफ इंडिया' (भारतीय ध्वज संहिता) नाम का एक कानून है, जिसमें तिरंगे को फहराने के नियम निर्धारित किए गए हैं।

 इन नियमों का उल्लंघन करने वालों को जेल भी हो सकती है। तिरंगा हमेशा कॉटन, सिल्क या फिर खादी का ही होना चाहिए। प्लास्टिक का झंडा बनाने की मनाही है।

तिरंगे का निर्माण हमेशा रेक्टेंगल शेप में ही होगा, जिसका अनुपात 3:2 तय है।

 वहीं जबकि अशोक चक्र का कोई माप तय नही हैं सिर्फ इसमें 24 तिल्लियां होनी आवश्यक हैं। 

झंडे पर कुछ भी बनाना या लिखना गैरकानूनी है।

 किसी भी गाड़ी के पीछे, बोट या प्लेन में तिरंगा नहीं लगाया जा सकता और न ही इसका प्रयोग किसी बिल्डिंग को ढकने किया जा सकता है।

किसी भी स्थिति में तिरंगा जमीन पर टच नहीं होना चाहिए। यह इसका अपमान होता है।

 तिरंगे को किसी भी प्रकार के यूनिफॉर्म या सजावट में प्रयोग में नहीं लाया जा सकता।

 भारत में बेंगलुरू से 420 किमी स्थित हुबली एक मात्र लाइसेंस प्राप्त संस्थान हैं जो झंडा बनाने का और सप्लाई करने का काम करता है। किसी भी दूसरे झंडे को राष्ट्रीय झंडे से ऊंचा या ऊपर नहीं लगा सकते और न ही बराबर रख सकते हैं।

29 मई 1953 में भारत का राष्ट्रीय ध्वज तिरंगा सबसे ऊंची पर्वत की चोटी माउंट एवरेस्ट पर यूनियन जैक तथा नेपाली राष्ट्रीय ध्वज के साथ फहराता नजर आया था।

 इस समय शेरपा तेनजिंग और एडमंड माउंट हिलेरी ने एवरेस्ट फतह की थी।

 सांसद नवीन जिंदल की रिट याचिका पर सुप्रीम कोर्ट के निर्णय के बाद आम नागरिकों को अपने घरों या ऑफिस में आम दिनों में भी तिरंगा फहराने की अनुमति 22 दिसंबर 2002 के बाद मिली। तिरंगे को रात में फहराने की अनुमति साल 2009 में दी गई।

पूरे भारत में 21 × 14 फीट के झंडे केवल तीन जगह पर ही फहराए जाते हैं: कर्नाटक का नारगुंड किला, महाराष्ट्र का पनहाला किला और मध्य प्रदेश के ग्वालियर जिले में स्थित किला।

 राष्ट्रपति भवन के संग्रहालय में एक ऐसा लघु तिरंगा हैं, जिसे सोने के स्तंभ पर हीरे-जवाहरातों से जड़ कर बनाया गया है।

भारत के संविधान के अनुसार जब किसी राष्ट्र विभूति का निधन होने और राष्ट्रीय शोक घोषित होने पर कुछ समय के लिए ध्वज को झुका दिया जाता है।

 लेकिन सिर्फ उसी भवन का तिरंगा झुकाया जाता है जिस भवन में उस विभूति का पार्थिव शरीर रखा है। जैसे ही पार्थिव शरीर को भवन से बाहर निकाला जाता है, वैसे ही ध्वज को पूरी ऊंचाई तक फहरा दिया जाता है।

देश के लिए जान देने वाले शहीदों और देश की महान शख्सियतों को तिरंगे में लपेटा जाता है। इस दौरान केसरिया पट्टी सिर की तरफ और हरी पट्टी पैरों की तरफ होनी चाहिए।

 शव को जलाने या दफनाने के बाद उसे गोपनीय तरीके से सम्मान के साथ जला दिया जाता है या फिर वजन बांधकर पवित्र नदी में जल समाधि दे दी जाती हैं।

 कटे-फटे या रंग उड़े हुए तिरंगे को भी सम्मान के साथ जला दिया जाता है या फिर वजन बांधकर पवित्र नदी में जल समाधि दे दी जाती है।

अशोक चक्र की 24 तीलियों (spokes) का अर्थ - 

महान बौद्ध सम्राट अशोक के बहुत से शिलालेखों पर एक चक्र (पहिया) बना हुआ है इसे अशोक चक्र कहते हैं। यह चक्र *"धम्म चक्र"* का प्रतीक है। 

सारनाथ स्थित सिंह-चतुर्मुख (लॉयन कपिटल) एवं अशोक स्तम्भ पर अशोक चक्र विद्यमान है। भारत के राष्ट्रीय ध्वज में अशोक चक्र को स्थान दिया गया है।

अशोक चक्र को कर्तव्य का पहिया भी कहा जाता है। ये 24 तीलियाँ मनुष्य के 24 गुणों को दर्शाती हैं । दूसरे शब्दों में, इन्हें मनुष्य के लिए बनाए गए 24 धर्म मार्ग भी कहा जा सकता है, जो किसी भी देश को उन्नति के पथ पर पहुंचा सकते हैं। इसी कारण हमारे राष्ट्रध्वज के निर्माताओं ने जब इसको अंतिम रूप दिया तो उन्होंने झंडे के बीच से चरखे को हटाकर इस अशोक चक्र को रखा था।

आइए, अब अशोक चक्र में दी गयी सभी तीलियों का अर्थ (चक्र के क्रमानुसार) जानते हैं-

1. पहली तीली :- *संयम* (संयमित जीवन जीने की प्रेरणा देती है)

2. दूसरी तीली :- *आरोग्य* (निरोगी जीवन जीने के लिए प्रेरित करती है)

3. तीसरी तीली :- *शांति* (देश में शांति व्यवस्था कायम रखने की सलाह)

4. चौथी तीली :- *त्याग* (देश एवं समाज के लिए त्याग की भावना का विकास)

5. पांचवीं तीली :- *शील* (व्यक्तिगत स्वभाव में शीलता की शिक्षा)

6. छठवीं तीली :- *सेवा* (देश एवं समाज की सेवा की शिक्षा)

7. सातवीं तीली :- *क्षमा* (मनुष्य एवं प्राणियों के प्रति क्षमा की भावना)

8. आठवीं तीली :- *प्रेम* (देश एवं समाज के प्रति प्रेम की भावना)

9. नौवीं तीली :- *मैत्री* (समाज में मैत्री की भावना)

10. दसवीं तीली :- *बन्धुत्व* (देश प्रेम एवं बंधुत्व को बढ़ावा देना)

11. ग्यारहवीं तीली :- *संगठन* (राष्ट्र की एकता और अखंडता को मजबूत रखना)

12. बारहवीं तीली :- *कल्याण* (देश व समाज के लिये कल्याणकारी कार्यों में भाग लेना)

13. तेरहवीं तीली :- *समृद्धि* (देश एवं समाज की समृद्धि में योगदान देना)

14. चौदहवीं तीली :- *उद्योग* (देश की औद्योगिक प्रगति में सहायता करना)

15. पंद्रहवीं तीली :- *सुरक्षा* (देश की सुरक्षा के लिए सदैव तैयार रहना)

16. सौलहवीं तीली :- *नियम* (निजी जिंदगी में नियम संयम से बर्ताव करना)

17. सत्रहवीं तीली :- *समता* (समता मूलक समाज की स्थापना करना)

18. अठारहवीं तीली :- *अर्थ* (धन का सदुपयोग करना)

19. उन्नीसवीं तीली :- *नीति* (देश की नीति के प्रति निष्ठा रखना)

20. बीसवीं तीली :- *न्याय* (सभी के लिए न्याय की बात करना)

21. इक्कीसवीं तीली :- *सहयोग* (आपस में मिलजुल कार्य करना)

22. बाईसवीं तीली :- *कर्तव्य* (अपने कर्तव्यों का ईमानदारी से पालन करना) 

23. तेईसवीं तीली :- *अधिकार* (अधिकारों का दुरूपयोग न करना)

24. चौबीसवीं तीली :- *बुद्धिमत्ता* (देश की समृद्धि के लिए स्वयं का बौद्धिक विकास करना)

इस प्रकार अशोक चक्र में दी गई हर एक तीली का अपना अर्थ है, सभी तीलियाँ सम्मिलित रूप से देश और समाज के बहुमुखी विकास की बात करती हैं। ये तीलियाँ सभी देशवासियों को उनके अधिकारों और कर्तव्यों के बारे में स्पष्ट सन्देश देने के साथ-साथ यह भी बतातीं हैं कि हमें रंग, रूप, जाति और धर्म के अंतरों को भुलाकर पूरे देश को एकता के धागे में पिरोकर समृद्धि के शिखर तक ले जाने के लिए सतत् प्रयास करते रहना चाहिए।

।। जय हिन्द।।

पेड़ पानी पर्यावरण प्रकृति और पृथ्वी के संरक्षण हेतु जल जंगल जमीन जीव जंतु तथा जलवायु को बचाना जरूरी है। ।। एक पेड़ - एक जिन्दगी।।

।। जय हिन्द।।


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