Saturday, December 17, 2022

इतिहास की प्रमुख घटनाएँ

 @ इतिहास की प्रमुख घटनाएँ 

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भगवान महावीर का जन्म :- 540 ई०पू०

महावीर का निर्वाण :- 468 ई०पू०

गौतम बुद्ध का जन्म :- 563 ई०पू०

गौतम बुद्ध का महापरिवार्न :- 483 ई०पू०

सिकंदर का भारत पर आक्रमण :- 326-325 ई०पू०

अशोक द्वारा कलिंग पर विजय :- 261 ई०पू०

विक्रम संवत् का आरम्भ :- 58 ई०पू०

शक् संवत् का आरम्भ :- 78 ई०पू०

हिजरी संवत् का आरम्भ :- 622 ई०

फाह्यान की भारत यात्रा :- 405-11 ई०

हर्षवर्धन का शासन :- 606-647 ई०

हेनसांग की भारत यात्रा :- 630 ई०

सोमनाथ मंदिर पर आक्रमण :- 1025 ई०

तराईन का प्रथम युद्ध :- 1191 ई०

तराईन का द्वितीय युद्ध :- 1192 ई०

गुलाम वंश की स्थापना :- 1206 ई०

वास्कोडिगामा का भारत आगमन :- 1498 ई०

पानीपत का प्रथम युद्ध :- 1526 ई०

पानीपत का द्वितीय युद्ध :- 1556 ई०

पानीपत का तृतीय युद्ध :- 1761 ई०

अकबर का राज्यारोहण :- 1556 ई०

हल्दी घाटी का युद्ध :- 1576 ई०

दीन-ए-इलाही धर्म की स्थापना :- 1582 ई०

प्लासी का युद्ध :- 1757 ई०

बक्सर का युद्ध :- 1764 ई०

बंगाल में स्थायी बंदोबस्त :- 1793 ई०

बंगाल में प्रथम विभाजन : 1905 ई०


मुस्लिम लीग की स्थापना :- 1906 ई०

मार्ले - मिन्टो सुधार :- 1909 ई०

प्रथम विश्वयुद्ध :- 1914 -18 ई०

द्वितीय विश्वयुद्ध :- 1939 - 45 ई०

असहयोग आंदोलन :- 1920 - 22 ई०

साइमन कमीशन का आगमन :- 1928 ई०

दांडी मार्च नमक सत्याग्रह :- 1930 ई०

गाँधी इरविन समझौता :- 1931 ई०

कैबिनेट मिशन का आगमन :- 1946 ई०

महात्मा गांधी की हत्या :- 1948 ई०

चीन का भारत पर आगक्रम :- 1962 ई०

भारत - पाक युद्ध :- 1965 ई०

ताशकंद- समझौता :- 1966 ई०

तालिकोटा का युद्ध :- 1565 ई०

प्रथम आंग्ल-मैसूर युद्ध :- 1776- 69 ई०

द्वितीय आंग्ल-मैसूर युद्ध :- 1780- 84 ई०

तृतीय आंग्ल-मैसूर युद्ध :- 1790- 92 ई०

चतुर्थ आंग्ल-मैसूर युद्ध :- 1799 ई०

कारगिल युद्ध :- 1999 ई०

प्रथम गोलमेज सम्मेलन :- 1930 ई०

द्वितीय गोलमेज सम्मेलन:- 1931 ई०

तृतीय गोलमेज सम्मेलन :- 1932 ई०

क्रिप्स मिशन का आगमन :- 1942 ई०

चीनी क्रांति :- 1911 ई०

फ्रांसीसी क्रांती :- 1789 ई०

रुसी क्रांति :- 1917 ई०

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।। जय हिन्द।।

Friday, November 19, 2021

294th Birthday of Pink City Jaipur

 *294th Birthday of Pink City* 


*जयपुर में हुआ था दुनिया का आखिरी अश्वमेध यज्ञ: घी से भर गई थी 50 फीट गहरी बावड़ी, 3 करोड़ लोगों को कराया था भोज*


18 नवंबर 1727 को बसा जयपुर आज 294 साल का हो गया है। शतरंज के आकार में बसाए गए जयपुर की सीमा 9 मील की थी, जिसे ब्रह्मांड में नौ ग्रहों के नवनिधि सिद्धांत पर वास्तुकला के आधार पर नौ चौकड़ियों में बसाया गया। ज्योतिष विद्वान पंडित जगन्नाथ सम्राट, विद्याधर भट्‌टाचार्य और राजगुरू रत्नाकर पौंड्रिक सहित कई विद्वानों ने जयपुर की स्थापना के लिए गंगापोल पर नींव रखी थी।


इस खूबसूरत शहर की नींव रखने के समय सवाई जयसिंह (द्वितीय) ने अश्वमेध यज्ञ करवाया था। इतिहासकारों के मुताबिक यह संसार का आखिरी और कलयुग का पहला अश्वमेध यज्ञ था।


ब्रह्मांड के नौ ग्रहों के आधार पर जयपुर को नौ चौकड़ियों में बसाया गया। इनमें दो चौकड़ियों में राजपरिवार और शासकीय भवन बनाए। बाकी सात चौकड़ियों में आमजन को बसाया।


जयपुर फाउंडेशन के संस्थापक सियाशरण लश्करी बताते हैं कि करीब पांच हजार वर्ष पहले महाभारत काल में पांडवों ने अंतिम अश्वमेध यज्ञ करवाया था। सवाई जयसिंह ने यज्ञ करवाने के लिए गुजरात के विशेष पंडितों को यहां बुलाया था। इन्हीं पंडितों को ब्रह्मपुरी में बसाया गया था।


पंडित जगन्नाथ सम्राट की अध्यक्षता में गंगापोल पर जयपुर की नींव रखी गई। जिसमें आमेर के खजाने से करीब 1084 रुपए का खर्चा हुआ। नींव रखने की खुशी में सम्राट जगन्नाथ को हथरोई गांव की आठ बीघा जमीन दी गई। यह आजकल अजमेर रोड के पास हथरोई गढ़ी कहलाता है।


*सवा साल तक चले अश्वमेध यज्ञ में 3 करोड़ लोगों को कराया था भोज*

अश्वमेध यज्ञ के लिए दक्षिण भारत से वर्धराजन (भगवान विष्णु) की प्रतिमा जयपुर लाई गई थी। इसे तत्कालीन जागीरदार हीदा मीणा लेकर आए थे, जिनके नाम से आज सूरजपोल बाजार में रामगंज के पास हीदा की मोरी पहचानी जाती है। सियाशरण लश्करी के मुताबिक अश्वमेध यज्ञ करीब सवा साल चला था। तब सवाई राजा जयसिंह और उनकी पत्नी ने 3 करोड़ लोगों को जिमाने (भोजन करवाने) का संकल्प लिया था। करीब सवा साल तक चले इस यज्ञ के पूरा होने तक लोगों को भोजन करवाया गया।


पुरानी बस्ती में स्थित है 300 साल पुरानी यज्ञशाला की बावड़ी। कहा जाता है कि अश्वमेध यज्ञ का प्रधान कुंड इसी के पास बनाया गया था। यहीं बावड़ी को घी से भर दिया गया था।


*यज्ञ में मिट्‌टी के गणेश को पहाड़ी पर किला बनाकर स्थापित किया, नाम पड़ा गढ़ गणेश*

ऐसी भी किवदंतियां है कि तब 52 हाथ का यानी करीब 65 फीट का एक हरे रंग का सांप रोजाना यज्ञ स्थल पर एक नियत स्थान पर आकर बैठता था। इसके बाद वह कभी नजर नहीं आया। यज्ञ में जिन भगवान विष्णु की पूजा अर्चना की गई। उन भगवान वर्धराजन का मंदिर आज आमेर रोड पर जलमहल के सामने स्थित है। इसी तरह यज्ञ में मिट्‌टी के गणेश की प्रतिमा बनाई गई थी।


अश्वमेध यज्ञ में मिट्‌टी के गणेश जी की पूजा की गई। यज्ञ समाप्ति के बाद उत्तर दिशा में अरावली की पहाड़ी की एक चोटी पर किला बनाकर गणेश जी को स्थापित किया, जिसको आज गढ़ गणेश मंदिर कहा जाता है।


यज्ञ पूरा होने के बाद भगवान गणेश की प्रतिमा को जयपुर में उत्तर दिशा में अरावली पर्वतमाला की चोटी पर विराजित करवाया गया। आज यह स्थान गढ़ गणेश के नाम से प्रसिद्ध है। लश्करी के मुताबिक हवन में भगवान शिव की पूजा भी की गई। वह मूर्ति आज ब्रह्मपुरी में है, जो कि जागेश्वर महादेव मंदिर के नाम से प्रसिद्ध है। वहीं, हनुमान जी की प्रतिमा को जलमहल के सामने स्थापित किया। जो कि काले हनुमान जी का मंदिर है।


यज्ञशाला की बावड़ी के पास आज भी प्रधान कुंड की जगह पर एक प्रतीक चिन्ह है। जिसमें अब हनुमान जी का मंदिर है। आठ पीढ़ियों से पुजारी यहां सेवा पूजा कर रहे हैं।


*यज्ञ के लिए घी से भर गई थी बावड़ी, नाम पड़ा यज्ञ शाला की बावड़ी*

इस अश्वमेध यज्ञ के लिए "प्रधान कुंड" पुरानी बस्ती में नाहरगढ़ किले के नीचे बनाया गया था। यहीं, एक बावड़ी का निर्माण करवाया गया। बताया जाता है कि यज्ञ के लिए इस बावड़ी को घी से भरा गया था। आज भी वह स्थान यज्ञ शाला की बावड़ी के नाम से पहचान रखती है। वहीं, बावड़ी के पास जहां प्रधान यज्ञ कुंड था, वहां भगवान हनुमान जी और भगवान राम ठाकुर जी के रूप में विराजमान है।


यहीं, एक प्रतीक चिन्ह भी है। लश्करी के मुताबिक आजादी के करीब 10 साल पहले त्रिपोलिया गेट के नीचे खुदाई के दौरान सुरंग मिली थी। जिसमें अश्वमेध यज्ञ की चौकियां और पेटिंग्स निकली थीं। इनको राजपरिवार ने खास मोहर में रखवा दिया था।


जयपुर की स्थापना के वक्त पूर्व दिशा में सूरजपोल और पश्चिम दिशा में चंद्रपोल गेट (चांदपोल) बनाया। 200 साल पहले चांदपोल गेट का दृश्य


*भगवान राम के पुत्र कुश से जुड़ा है जयपुर का पूर्व राजपरिवार*

बता दें कि जयपुर का पूर्व राजपरिवार भगवान राम के वंशजों से जुड़ाव रखता है। कहा जाता है कि पूर्व राजघराने के महाराजा पद्मनाभ भगवान राम के बड़े पुत्र कुश की 309वीं पीढ़ी है। कुश की राजधानी बिहार में रोहिताशगढ़ हुआ करती थी। यहीं से उनकी पीढ़ियां मध्यप्रदेश में नरवर नाम की जगह पर पहुंची। वहां से दौसा आए। फिर रामगढ़ में कच्छवाहा वंश के राजाओं का राज रहा। इसके बाद वे आमेर पहुंचे और इसी को अपनी राजधानी बनाया। इसके बाद 1727 में जयपुर में गंगापोल पर स्थापना के लिए नींव रखी।


इतिहास के पन्नों में दर्ज है अश्वमेध यज्ञ का वर्णन। जिसमें कहा गया है कि यज्ञ समाप्ति के वक्त एक कन्या उत्पन्न हुई, जिसने भूत और भविष्य की बातें कही। बाद में, वह अदृश्य हो गई। इसी तरह, 52 हाथ लंबे एक हरे रंग के सर्प को आह्वान कर बुलाया गया।

Happy Birthday Jaipur 



Sunday, August 15, 2021

तिरंगा - कल, आज और कल

 तिरंगा - कल, आज और कल

भारतीय राष्‍ट्रीय ध्‍वज को इसके वर्तमान स्‍वरूप में 22 जुलाई 1947 को आयोजित भारतीय संविधान सभा की बैठक के दौरान अपनाया गया था, जो 15 अगस्‍त 1947 को अंग्रेजों से भारत की स्‍वतंत्रता के कुछ ही दिन पूर्व की घटना थी। तिरंगे को 15 अगस्‍त 1947 और 26 जनवरी 1950 के बीच भारत के राष्‍ट्रीय ध्‍वज के रूप में अपनाया गया।

हमारे लिए तिरंगा बेहद महत्वपूर्ण और गौरव का विषय है। इस नाम के पीछे की वजह इसमें इस्तेमाल होने वाले तीन रंग हैं, केसरिया, सफेद और हरा। इसके मौजूदा स्वरूप का विकास भी कई पड़ावों में हुआ है।

तिरंगे की ऐतिहासिक पृष्ठभूमि -

हमारा राष्ट्रीय ध्वज का विकास आज के इस रूप में पहुंचने के लिए अनेक दौरों में से गुजरा। एक रूप से यह राष्ट्र में राजनैतिक विकास को दर्शाता है. हमारे राष्‍ट्रीय ध्‍वज के विकास में कुछ ऐतिहासिक पड़ाव भी आए। 

1906 में पहला राष्ट्रीय ध्वज -

पहला राष्‍ट्रीय ध्‍वज 7 अगस्‍त 1906 को पारसी बागान चौक (ग्रीन पार्क) कलकत्ता में फहराया गया था, जिसे अब कोलकाता कहते हैं। इस ध्‍वज को लाल, पीले और हरे रंग की क्षैतिज पट्टियों से बनाया गया था. इसमें ऊपर हरा, बीच में पीला और नीचे लाल रंग था. साथ ही इसमें कमल के फूल और चांद-सूरज भी बने थे

1907 में दूसरा राष्ट्रीय ध्वज - 

भारत का पहला गैर आधिकारिक ध्वज अधिक समय तक नहीं रहा और भारत को अगले ही साल नया राष्ट्र ध्वज मिला.दूसरा राष्ट्रीय ध्वज पेरिस में मैडम कामा और 1907 में उनके साथ निर्वासित किए गए कुछ क्रांतिकारियों द्वारा फहराया गया था. हालांकि, कई लोगों का कहना है कि यह घटना 1905 में हुई थी. यह भी पहले ध्‍वज के जैसा ही था. इस राष्ट्रध्वज में भी चांद सितारे आदि मौजूद था. साथ ही इसमें तीन रंग केसरिया, हरा और पीला शामिल था. बाद में इसे एक सम्मलेन के दौरान बर्लिन में भी फहराया गया था

1917 में तीसरा राष्ट्रीय ध्वज - 

तीसरा झंडा, 1917 में आया जब हमारे राजनैतिक संघर्ष ने एक निश्चित मोड लिया. डॉ. एनी बीसेंट और लोकमान्‍य तिलक ने घरेलू शासन आंदोलन के दौरान इसे फहराया. इस झंडे में 5 लाल और 4 हरी क्षैतिज पट्टियां एक के बाद एक और सप्‍तऋषि के अभिविन्‍यास में इस पर बने 7 सितारे थे. वहीं, बांई और ऊपरी किनारे पर (खंभे की ओर) यूनियन जैक था. एक कोने में सफेद अर्धचंद्र और सितारा भी था

1921 में चौथा राष्ट्रीय ध्वज - 

चौथा ध्वज अखिल भारतीय कांग्रेस कमेटी के सत्र के दौरान आंध्र प्रदेश के एक युवक ने एक झंडा बनाया और गांधी जी को दिया. यह कार्यक्रम साल 1921 में बेजवाड़ा (अब विजयवाड़ा) में किया गया था. यह दो रंगों का बना हुआ था. लाल और हरा रंग जो दो प्रमुख समुदायों अर्थात हिन्‍दू और मुस्लिम का प्रतिनिधित्‍व करता है. गांधी जी ने सुझाव दिया कि भारत के शेष समुदाय का प्रतिनिधित्‍व करने के लिए इसमें एक सफेद पट्टी और राष्‍ट्र की प्रगति का संकेत देने के लिए एक चलता हुआ चरखा होना चाहिए

1931 में पांचवां राष्ट्रीय ध्वज - 

1921 में निर्मित भारत का चौथा राष्ट्र ध्वज 10 सालों तक अस्तित्व में रहा. 1931 में हिंदुस्तान को एक बार फिर नया राष्ट्रध्वज मिला. चौथे राष्ट्रध्वज की तरह ही पांचवे राष्ट्रध्वज में भी चरखा का महत्वपूर्ण स्थान रहा. हालांकि रंगों में इस बार हेर-फेर हुआ. चरखा के साथ ही केसरिया, सफ़ेद और हरे रंग का संगम रहा. इंडियन नेशनल कांग्रेस (आईएनसी) ने औपचारिक रूप से इस ध्वज को अपनाया था

1947 को छठवां राष्ट्रीय ध्वज - 

अभी जो तिरंगा फहराया जाता है उसे 22 जुलाई 1947 को अपनाया गया था। तिरंगे को आंध्रप्रदेश के पिंगली वैंकैया ने बनाया था। वहीं  तिरंगे को फहराने के कुछ नियम भी हैं।

किसी मंच पर तिरंगा फहराते समय जब बोलने वाले का मुंह श्रोताओं की तरफ हो तब तिरंगा हमेशा उसके दाहिने तरफ होना चाहिए। बताया जाता है कि भारत के राष्ट्रीय ध्वज में जब चरखे की जगह अशोक चक्र लिया गया तो महात्मा गांधी नाराज हो गए थे। रांची का पहाड़ी मंदिर भारत का अकेला ऐसा मंदिर हैं जहां तिरंगा फहराया जाता हैं।

493 मीटर की ऊंचाई पर देश का सबसे ऊंचा झंडा भी रांची में ही फहराया गया है।

देश में 'फ्लैग कोड ऑफ इंडिया' (भारतीय ध्वज संहिता) नाम का एक कानून है, जिसमें तिरंगे को फहराने के नियम निर्धारित किए गए हैं।

 इन नियमों का उल्लंघन करने वालों को जेल भी हो सकती है। तिरंगा हमेशा कॉटन, सिल्क या फिर खादी का ही होना चाहिए। प्लास्टिक का झंडा बनाने की मनाही है।

तिरंगे का निर्माण हमेशा रेक्टेंगल शेप में ही होगा, जिसका अनुपात 3:2 तय है।

 वहीं जबकि अशोक चक्र का कोई माप तय नही हैं सिर्फ इसमें 24 तिल्लियां होनी आवश्यक हैं। 

झंडे पर कुछ भी बनाना या लिखना गैरकानूनी है।

 किसी भी गाड़ी के पीछे, बोट या प्लेन में तिरंगा नहीं लगाया जा सकता और न ही इसका प्रयोग किसी बिल्डिंग को ढकने किया जा सकता है।

किसी भी स्थिति में तिरंगा जमीन पर टच नहीं होना चाहिए। यह इसका अपमान होता है।

 तिरंगे को किसी भी प्रकार के यूनिफॉर्म या सजावट में प्रयोग में नहीं लाया जा सकता।

 भारत में बेंगलुरू से 420 किमी स्थित हुबली एक मात्र लाइसेंस प्राप्त संस्थान हैं जो झंडा बनाने का और सप्लाई करने का काम करता है। किसी भी दूसरे झंडे को राष्ट्रीय झंडे से ऊंचा या ऊपर नहीं लगा सकते और न ही बराबर रख सकते हैं।

29 मई 1953 में भारत का राष्ट्रीय ध्वज तिरंगा सबसे ऊंची पर्वत की चोटी माउंट एवरेस्ट पर यूनियन जैक तथा नेपाली राष्ट्रीय ध्वज के साथ फहराता नजर आया था।

 इस समय शेरपा तेनजिंग और एडमंड माउंट हिलेरी ने एवरेस्ट फतह की थी।

 सांसद नवीन जिंदल की रिट याचिका पर सुप्रीम कोर्ट के निर्णय के बाद आम नागरिकों को अपने घरों या ऑफिस में आम दिनों में भी तिरंगा फहराने की अनुमति 22 दिसंबर 2002 के बाद मिली। तिरंगे को रात में फहराने की अनुमति साल 2009 में दी गई।

पूरे भारत में 21 × 14 फीट के झंडे केवल तीन जगह पर ही फहराए जाते हैं: कर्नाटक का नारगुंड किला, महाराष्ट्र का पनहाला किला और मध्य प्रदेश के ग्वालियर जिले में स्थित किला।

 राष्ट्रपति भवन के संग्रहालय में एक ऐसा लघु तिरंगा हैं, जिसे सोने के स्तंभ पर हीरे-जवाहरातों से जड़ कर बनाया गया है।

भारत के संविधान के अनुसार जब किसी राष्ट्र विभूति का निधन होने और राष्ट्रीय शोक घोषित होने पर कुछ समय के लिए ध्वज को झुका दिया जाता है।

 लेकिन सिर्फ उसी भवन का तिरंगा झुकाया जाता है जिस भवन में उस विभूति का पार्थिव शरीर रखा है। जैसे ही पार्थिव शरीर को भवन से बाहर निकाला जाता है, वैसे ही ध्वज को पूरी ऊंचाई तक फहरा दिया जाता है।

देश के लिए जान देने वाले शहीदों और देश की महान शख्सियतों को तिरंगे में लपेटा जाता है। इस दौरान केसरिया पट्टी सिर की तरफ और हरी पट्टी पैरों की तरफ होनी चाहिए।

 शव को जलाने या दफनाने के बाद उसे गोपनीय तरीके से सम्मान के साथ जला दिया जाता है या फिर वजन बांधकर पवित्र नदी में जल समाधि दे दी जाती हैं।

 कटे-फटे या रंग उड़े हुए तिरंगे को भी सम्मान के साथ जला दिया जाता है या फिर वजन बांधकर पवित्र नदी में जल समाधि दे दी जाती है।

अशोक चक्र की 24 तीलियों (spokes) का अर्थ - 

महान बौद्ध सम्राट अशोक के बहुत से शिलालेखों पर एक चक्र (पहिया) बना हुआ है इसे अशोक चक्र कहते हैं। यह चक्र *"धम्म चक्र"* का प्रतीक है। 

सारनाथ स्थित सिंह-चतुर्मुख (लॉयन कपिटल) एवं अशोक स्तम्भ पर अशोक चक्र विद्यमान है। भारत के राष्ट्रीय ध्वज में अशोक चक्र को स्थान दिया गया है।

अशोक चक्र को कर्तव्य का पहिया भी कहा जाता है। ये 24 तीलियाँ मनुष्य के 24 गुणों को दर्शाती हैं । दूसरे शब्दों में, इन्हें मनुष्य के लिए बनाए गए 24 धर्म मार्ग भी कहा जा सकता है, जो किसी भी देश को उन्नति के पथ पर पहुंचा सकते हैं। इसी कारण हमारे राष्ट्रध्वज के निर्माताओं ने जब इसको अंतिम रूप दिया तो उन्होंने झंडे के बीच से चरखे को हटाकर इस अशोक चक्र को रखा था।

आइए, अब अशोक चक्र में दी गयी सभी तीलियों का अर्थ (चक्र के क्रमानुसार) जानते हैं-

1. पहली तीली :- *संयम* (संयमित जीवन जीने की प्रेरणा देती है)

2. दूसरी तीली :- *आरोग्य* (निरोगी जीवन जीने के लिए प्रेरित करती है)

3. तीसरी तीली :- *शांति* (देश में शांति व्यवस्था कायम रखने की सलाह)

4. चौथी तीली :- *त्याग* (देश एवं समाज के लिए त्याग की भावना का विकास)

5. पांचवीं तीली :- *शील* (व्यक्तिगत स्वभाव में शीलता की शिक्षा)

6. छठवीं तीली :- *सेवा* (देश एवं समाज की सेवा की शिक्षा)

7. सातवीं तीली :- *क्षमा* (मनुष्य एवं प्राणियों के प्रति क्षमा की भावना)

8. आठवीं तीली :- *प्रेम* (देश एवं समाज के प्रति प्रेम की भावना)

9. नौवीं तीली :- *मैत्री* (समाज में मैत्री की भावना)

10. दसवीं तीली :- *बन्धुत्व* (देश प्रेम एवं बंधुत्व को बढ़ावा देना)

11. ग्यारहवीं तीली :- *संगठन* (राष्ट्र की एकता और अखंडता को मजबूत रखना)

12. बारहवीं तीली :- *कल्याण* (देश व समाज के लिये कल्याणकारी कार्यों में भाग लेना)

13. तेरहवीं तीली :- *समृद्धि* (देश एवं समाज की समृद्धि में योगदान देना)

14. चौदहवीं तीली :- *उद्योग* (देश की औद्योगिक प्रगति में सहायता करना)

15. पंद्रहवीं तीली :- *सुरक्षा* (देश की सुरक्षा के लिए सदैव तैयार रहना)

16. सौलहवीं तीली :- *नियम* (निजी जिंदगी में नियम संयम से बर्ताव करना)

17. सत्रहवीं तीली :- *समता* (समता मूलक समाज की स्थापना करना)

18. अठारहवीं तीली :- *अर्थ* (धन का सदुपयोग करना)

19. उन्नीसवीं तीली :- *नीति* (देश की नीति के प्रति निष्ठा रखना)

20. बीसवीं तीली :- *न्याय* (सभी के लिए न्याय की बात करना)

21. इक्कीसवीं तीली :- *सहयोग* (आपस में मिलजुल कार्य करना)

22. बाईसवीं तीली :- *कर्तव्य* (अपने कर्तव्यों का ईमानदारी से पालन करना) 

23. तेईसवीं तीली :- *अधिकार* (अधिकारों का दुरूपयोग न करना)

24. चौबीसवीं तीली :- *बुद्धिमत्ता* (देश की समृद्धि के लिए स्वयं का बौद्धिक विकास करना)

इस प्रकार अशोक चक्र में दी गई हर एक तीली का अपना अर्थ है, सभी तीलियाँ सम्मिलित रूप से देश और समाज के बहुमुखी विकास की बात करती हैं। ये तीलियाँ सभी देशवासियों को उनके अधिकारों और कर्तव्यों के बारे में स्पष्ट सन्देश देने के साथ-साथ यह भी बतातीं हैं कि हमें रंग, रूप, जाति और धर्म के अंतरों को भुलाकर पूरे देश को एकता के धागे में पिरोकर समृद्धि के शिखर तक ले जाने के लिए सतत् प्रयास करते रहना चाहिए।

।। जय हिन्द।।

पेड़ पानी पर्यावरण प्रकृति और पृथ्वी के संरक्षण हेतु जल जंगल जमीन जीव जंतु तथा जलवायु को बचाना जरूरी है। ।। एक पेड़ - एक जिन्दगी।।

।। जय हिन्द।।


Saturday, June 30, 2018

Dr G L Sharma, RAS



Dr G L Sharma, 
Senior RAS Officer
 
 डॉ गोवर्धन लाल शर्मा एक समाजशास्त्री, कानूनविद्लेखककाउंसलर, मोटिवेशन ल गुरू एवं प्रशासक के रूप में पहचान रखते हैं। आपने समाजशास्त्रमनोविज्ञानराजनीतिशास्त्रमानवाधिकार एवं विधि में स्नातकोत्तर की उपाधि प्राप्त की है। समाजशास्त्र में आप नेट-स्लेट एवं पी-एच.डी. हैं।

   आपकी दो दर्जन से अधिक पुस्तकें नामचीन प्रकाशकों (उपकाररावतप्रभातराजस्थान हिंदी ग्रंथ अकादमीयूनिवर्सिटी बुक हाउस इत्यादि) से प्रकाशित हो चुकी हैं। आपके 50 से अधिक लेख एवं शोध-पत्र विभिन्न राष्ट्रीय एवं अंतर्राष्ट्रीय जर्नल तथा पत्र-पत्रिकाओं में प्रकाशित हो चुके हैं। सामाजिक मुद्दों एवं अन्य विभिन्न विषयों पर आयोजित दो दर्जन से अधिक राष्ट्रीय एवं अन्तरराष्ट्रीय सेमिनारों में आप शोध-पत्र वाचन कर चुके हैं। इस हेतु आप स्वीडनडेनमार्कनार्वेफिनलैण्ड एवं नेपाल की यात्राएं कर चुके हैं।

         नर्सिंग प्रोफेशन से अपने कैरियर की शुरूआत करने वाले डॉ. शर्मा निरन्तर अध्ययन-अध्यापन के दौरान सिविल सेवा प्रतियोगी परीक्षाओं के निःशुल्क मार्ग दर्शन से जुडे रहे हैं। आप आर.ए.एस. अलाइड सर्विस (राजस्थान एक्साइज) में सेवारत रहते हुए राजस्थान आबकारी सेवा संघ (राजस्थान एक्साइज सर्विस ऑफिसर्स एसोसिएशन) के प्रदेश अध्यक्ष रहे। आपने राजस्थान वाणिज्यिक कर विभाग में भी कनिष्ठ वाणिज्यिक कर अधिकारी के रूप में अपनी सेवाएं दी हैं। डॉ. शर्मा अन्तरराष्ट्रीय शोध पत्रिका पैनासीआ इन्टरनेशनल रिसर्च जर्नल के संस्थापक तथा अवैतनिक मार्गदर्शक हैं। सम्प्रति आप राजस्थान प्रशासनिक सेवा (RAS) के अधिकारी के रूप में उप जिला कलेक्टर एवं मजिस्ट्रेट के पद पर कार्यरत हैं।

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Book For RAS/RTS  By Dr G L Sharma, RAS
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